पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर किसी जज ने खुली अदालत में कोई आदेश सुना दिया है, तो उसकी खबर प्रकाशित करना अदालत की अवमानना नहीं माना जा सकता, भले ही उस आदेश पर अभी जज के हस्ताक्षर न हुए हों।
जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह और जस्टिस अमरजोत भट्टी की खंडपीठ ने The Tribune, Hindustan Times और Times of India के खिलाफ चल रही आपराधिक अवमानना की कार्रवाई को खत्म करते हुए यह फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि अगर किसी न्यायिक कार्यवाही की खबर सही और निष्पक्ष तरीके से प्रकाशित की गई है, तो उसे अवमानना नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि जैसे ही कोई फैसला अदालत में सुनाया जाता है, वह प्रभावी हो जाता है।`मामला 9 अप्रैल का है, जब जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने पंजाब पुलिस के कुछ पूर्व अधिकारियों से जुड़े एक केस की सुनवाई को फरीदकोट से चंडीगढ़ स्थानांतरित करने का आदेश खुली अदालत में सुनाया था।
अगले दिन The Tribune, Hindustan Times और Times of India ने इस फैसले से जुड़ी खबरें प्रकाशित कर दीं। हालांकि उस समय तक आदेश पर जज के हस्ताक्षर नहीं हुए थे।
इसके बाद 11 अप्रैल को जस्टिस दहिया ने कहा था कि इस तरह की रिपोर्टिंग अदालत की प्रक्रिया में दखल देने जैसी लगती है। इसी आधार पर The Tribune की एडिटर-इन-चीफ ज्योति मल्होत्रा समेत अन्य लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की गई थी।
बाद में इस मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच ने पाया कि फैसला वास्तव में खुली अदालत में सुनाया गया था और अखबारों ने उसकी सही रिपोर्टिंग की थी। अदालत ने कहा कि प्रकाशित खबरों में कोई गलत या भ्रामक जानकारी नहीं थी।
इसी आधार पर कोर्ट ने अवमानना की याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में आगे किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं है।
वैसे इस फैसले को मीडिया की न्यायिक रिपोर्टिंग और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Picture Source :

